Wednesday, November 25, 2009

दस लोगों मैं इतना दम था.....

दस लोगों मैं इतना दम था,
मेरे मुल्क को ललकारा थे।
सीना इसका छलनी करके,
भाग जाना इरादा था।
पर जीता वह जज़्बा था,
कामयाबी जीसका नारा था।

बाहरसे दस आए थे,
पर देश मैं बहुत सारे हैं।
रोज़ हमे ललकारे हैं,
छलनी सीना कर जातें हैं।

सच्च बोलूँ तोह मारे हैं,
अलग भाषा बोलूँ तोह मारे हैं।
जात पात के नामसे,
देश को वोह बाट रहें।

सरहद पारसे दस आयेंगे,
यह सोच हम घबरातें हैं।
घरके अंदर जो इतने हैं,
फिरभी उनको हम क्यों चुनते हैं।

धोका उनसे हम खातें हैं,
पर उनको ही हम चुनते हैं,
इसलिए
दस लोगो मैं इतना दम था,
मेरे मुल्क को ललकारा था।

7 comments:

shama said...

Khayalat achhe hain...wartanee me zara adhik dhyan den to aur adhik pathneey hoga...jaise lalkara the...lalkara tha,hona chahiye!
Bura nahi mana?

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना। बधाई। ब्लॉगजगत में स्वागत।

नारदमुनि said...

jai hind.narayan narayan

हास्यफुहार said...

swagat,

My Love said...

bahut khub

alka sarwat said...

gurmeet ji,
जीवन दर्शन की ये बातें ,मन मेरा बहलाती हैं
आपका स्वागत है ब्लागिंग में ,हवाएं गुनगुनाती हैं